विदेश पर किया भरोसा, देश हुआ पराया

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हर प्रधानमंत्री और उसकी सरकार की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। वह उसके अनुसार अपना कार्य करता है। हमारी इस सरकार की प्राथमिकताएं हमारे प्रधानमंत्री जी के विदेश दौरों से साफ झलकती हैं। उनका सारा जोर विदेश और विदेशी दौरों पर ही लगा है। 15 माह में 25 देश के दौरे का वर्ल्ड रिकार्ड बनाते जा रहे हैं। कई ऐसे देशों में उनके दौरे हुए हैं जहां पूर्व के प्रधानमंत्री या तो गए ही नहीं या बहुत कम गए। इस बाबद उन्होंने इस पर जोर भी बहुत दिया। भारत का परचम विश्व में लहराने की बेताब कोशिश भी की। कई तरह के समझौते भी किए। इन सबका कितना असर होगा ये तो वक्त ही बताएगा। निश्चित तौर पर इन सब बातों का असर होता है किंतु तब, जब आपके घर यानि देश में सब कुछ ठीक हो, अच्छा हो। अभी तो यह स्थिति है जैसे ’घर फूंक तमाशा देख’। देश व देश के हालात अस्त-व्यस्त हो रहे हैं और हम अपना गुणगान कर विश्व विजेता बनने निकल पड़े। कुछ समय पहले ही अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत आए थे। प्रधानमंत्री जी ने उनके सामने अपनी दोस्ती हंसी-मजाक स्तर तक की कही थी। उन्हीं ओबामा जी ने अमेरिका जाकर भारत को सीख दे डाली कि पहले साम्प्रदायिकता से निपटे भारत। अपनी दोस्ती और प्रगाढ़ रिश्तों पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया। ऐसे ही और भी देशों ने भारत का कथनी और करनी में अंतर कर मजाक बना दिया। विदेशों में अपने भाषणों के दौरान अपनी ही पूर्ववर्ती सरकारों को कठघरे में खड़ा करना, भारत का ही अपमान करना साबित होता है। ऐसा सब कुछ कर वे भारत का ही नुकसान कर रहे हैं। विदेशी पूंजी को आमंत्रित करना, वहां जा-जाकर, उन सबसे बात कर भारत में पूंजी निवेश के लिए तैयार करना, उनको प्रलोभन देना, अपनी गरज दिखाता है और देश की गरिमा को गिराता है।

इन सबकी बजाय यदि हम देश की आंतरिक समस्या और उसके निदान पर अपनी मेहनत लगाएंगे तो बाकी सब कुछ जो हम चाह रहे हैं वह स्वतः ही हो जाएगा। स्वच्छता, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा का स्तर, व्यापार-व्यवसाय को ठीक करना, ऐसी अनेकानेक समस्याएं हैं जिनका निराकरण करना बहुत जरूरी है। सरकार का राजनीतिक प्रपंचों से आगे बढ़कर देश हित की ओर देखना बहुत जरूरी है। अपनी निर्णय क्षमता और उसको अमल में लाना बहुत जरूरी है। अभी भी बहुत से ऐसे बिल हैं जो चर्चा के लिए तैयार हैं किंतु राजनीतिक कलाबाजियों में उलझकर रह गए हैं। विश्व में सिर्फ दिखावा करने से कुछ नहीं होता, अपने घर को सुधारोगे तो अपने आप ही उसका प्रभाव दिखने लगेगा। आज हमारे यहां का टैलेंट काफी कुछ विदेश चला जाता है। कारण साफ है कि उन्हें वहां का वातावरण और प्रगति ज्यादा अच्छी दिखाई देती है। हमारे उद्योगपति, व्यवसायी इसलिए उतना अच्छा काम नहीं कर पाते क्योंकि यहां उन्हें अच्छी परिस्थितियां उपलब्ध नहीं हैं। हमारे यहां का धन इसलिए कालाधन बनकर बाहर चला जाता है क्योंकि धन पर हमारी सोच यहां संकीर्ण है। कमाने को हमारे यहां गलत माना जाता है। ऐसे अनेक कारण हैं जो हम ठीक करेंगे तो हमें विश्व के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा और हमें सम्मानजनक स्थितियां स्वतः ही मिल जाएंगी। न हमारा धन बाहर जाएगा, न हमारा टैलेंट बाहर जाएगा। इसलिए पहले अपना घर ’देश’ संभालें तो बेहतर रहेगा।

जयहिंद।

 

सुमेश खंडेलवाल
प्रधान संपादक