सरकार की नौकरी की फ़िराक़ छोड़ शायरी के मैदान में कूद पड़े थे गोरखपुरी

Ravi Namdev

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चंद शब्दों के शेर में वो जादू होता है जो शायद हजारों शब्दों में भी नही होता। शायरी में वो सुकून होता है जो दुनिया के किसी हिस्से में नहीं होता। इन्हीं बातों को अपनी गज़लों से बयां करने वाले थे फ़िराक़ गोरखपुरी। इनकी गज़लों में वो जादू हैं जो दिल को सुकून और दर्द दोनों देते हैं। गोरखपुरी का जन्म 1896 में गोरखपुर में हुआ, नाम था रघुपति सहाय। ऐसा नहीं है कि वो किसी मजबूरी के चलते ही शायर बने या पढ़ने-लिखने में दिमाग नहीं लगता था। इन्होंने ग्रेजुएशन में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान हासिल किया था। इसके साथ ही आईसीएस सेवा में इनका चयन हुआ था। लेकिन ये सब छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इन्होंने इलाहबाद विश्वविधालय में प्रोफेसर के रूप में भी अपनी सेवाएं दी। यहीं पर इन्होंने ‘गुल-ए-नग़मा’ लिखी जिसके लिए उन्हे ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। फ़िराक़ गोरखपुरी धर्मनिरेपक्षता के लिए लगातार आवाज़ उठाते रहे। वो ‘‘उर्दू को मुसलमान की भाषा’’ वाली नीति पर भी रोक लगाने में कामयाब रहे। उनका निधन 3 मार्च 1982 को हुआ था। 28 अगस्त को उनके जन्मदिन के मौके पर हम आपको इन तस्वीरों के माध्यम से उनके कुछ चुनिन्दा शेर और दोहे पढ़वाने जा रहे हैं।

फ़िराक़ गोरखपुरी के चुनिन्दा शेर और दोहे