Friday, October 20th, 2017 12:31:04
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नयी सदी की नयी औरत: हिंदी सिनेमा का बदलता परिवेश




Entertainment

women's day 2

हिंदी सिनेमा में स्त्री किरदार

वर्ष 2000 से 2014 के बीच हिंदी सिनेमा के स्त्री किरदारों में अचानक नाटकीय बदलाव आया है. इन 15 सालों की चुनिंदा स्त्री प्रधान फिल्मों के साथ समाज में बदलती स्त्री भूमिकाओं का विश्लेषण

इंडियन सिनेमा में अगर किसी किरदार को सबसे अधिक स्टीरियोटाइप बनाकर रखा गया तो वह रही हैं औरतें. विभिन्न संस्कृतियों और कल्चर से परे जाकर बॉलीवुड ने औरतों को एक तय खांचे में बांध दिया. आमतौर पर उसे एक बहन, बेटी, मां और पत्नी के दायरे में कैद रखा गया जो या तो बलात्कार की शिकार होकर आत्महत्या कर लेती है या फिर अपने बेटे या अपने सुहाग की रक्षा के लिये खलनायक के आगे गिड़गिड़ाती रहती है.

अगर दूसरी संस्कृतियों की बात करें तो फिल्मों में मुस्लिम, पारसी और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं का चित्रण भी इस तय स्टीरियोटाइप को तोड़ नहीं सका है. यह सच है कि महबूब खान की मदर इंडिया, श्याम बेनेगल की अंकुर, केतन मेहता की मिर्च मसाला और शेखर कपूर की बैंडिट क्वीन जैसी कुछ फिल्मों ने इस तय ढांचे को तोडऩे की कोशिश की है, लेकिन हालात कमोबेश वैसे ही बने रहे.

एक बात जो ध्यान देने लायक है वह यह कि सन 2000 के बाद यानी नयी सदी में हिंदी सिनेमा के स्त्री किरदारों की छवि में अचानक बदलाव आना शुरू हो गया. यह बदलाव बहुत सुखद आश्चर्य से भर देने वाला था. आइये जानते हैं वर्ष 2000 से अब तक आयी चुनिंदा ऐसी फिल्मों के बारे में जिन्होंने हिंदुस्तानी स्त्री की इमेज को न केवल बदला है बल्कि इन फिल्मों में समाज की बदलती स्त्री की झलक भी देखी जा सकती है:

क्या कहना (2000)

वर्ष 2010 में आई कुंदन शाह की फिल्म क्या कहना ने अनब्याही मां जैसे जटिल और संवेदनशील विषय को उठाया. फिल्म की नायिका प्रिया (प्रीति जिंटा)अपने प्रेमी द्वारा ठुकराये जाने पर न केवल अकेले उसके बच्चे को जन्म देने का निश्चय करती है बल्कि वह अपने प्रेमी के वापस आने पर उसे ठुकरा भी देती है. हिंदी सिनेमा की यह एक नयी स्त्री थी जिसके लिये अपना आत्मसम्मान सामाजिक सुरक्षा से कहीं ज्यादा मजबूत है.

अस्तित्त्व (2000)

महेश मांजरेकर की फिल्म अस्तित्व की नायिका अदिति (तब्बू) जिस तरह अपने अस्तित्व को पहचानती है, वह हिंदी सिनेमा मेंं एक नया मोड़ था. अस्तित्व विवाहेत्तर संबंधों की फिल्म नहीं है, इस फिल्म का संबंध पुरुषवादी सोच मात्र से भी नहीं है. यह एक उपेक्षित स्त्री के अपने अस्तित्व को तलाशने की कहानी है. परिस्थितियां कुछ ऐसी बनती हैं कि वह एक बार विवाहेत्तर संबंध बना लेती है और गर्भवती  हो जाती है. उसके पति को इस बात का पता 27 साल बाद चलता है. पति के अहम को ठेस लगती है. अदिति कुछ ऐसे प्रश्न खड़े करती है जिनके जवाब उसके पति तो क्या पूरे समाज के पास नहीं हैं.

ब्लैक (2005)

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संजय लीला भंसाली की फिल्म ब्लैक एक गूंगी बहरी लड़की मिशेल (रानी मुखर्जी) की कहानी है. वह एक ऐसी लड़की है जिसके होने न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन एक दिन उसकी जिंदगी में उसके टीचर देवराज सहाय (अमिताभ बच्चन) का आगमन होता है और उसके बाद उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है. अपनी इन सीमाओं के साथ वह जीवन में ऐसी उपलब्धियां हासिल करती है जिनको हासिल करने के लिये सामान्य लोग तक तरसते हैं. यह एक नयी स्त्री है जो बिना नाचे गाये केवल अपनी प्रतिभा के बल पर आपको पलक तक नहीं झपकाने देती.

डर्टी पिक्चर (2011)

विद्या बालन अभिनीत फिल्म डर्टी पिक्चर एक साथ दो विरोधाभासों को साधती है. एक तरफ वह एक लगभग एक्स्ट्रा की भूमिका निभाने वाली कथित शरीफों की नजर में दो कौड़ी की औकात वाली औरत सिल्क की कहानी कहती है तो वहीं दूसरी ओर वह इन शरीफों के शराफत के ढोंग को बहुत सहज तरीके से बेनकाब करती है. हिंदी सिनेमा में पहली बार बुरी औरतों का समाज के प्रति नजरिया सामने आता है जहां वे सही लगती हैं और समाज गलत. डर्टी पिक्चर एक पॉवरफुल फिल्म है. जो हमारे बदलते समाज की आंखों में आंखे डालती है.

क्वीन (2014)

सन 2014 में आई विकास बहल की फिल्म क्वीन ने लड़कियों को बताया कि दरअसल क्वीन होने के लिये किसी राजा की नहीं बल्कि अपने दिल की रानी बनना जरूरी है. हीरोइन रानी मेहरा की शादी टूटती है, वह ब्रेकअप के गम से निकलने के लिये फ्रांस जाती है. अचानक वह पाती है कि इस दुनिया में तो सारे कमरे मिसेज सिंह, मिसेज शर्मा या मिसेज चौबे के नाम पर बुक हैं. अकेली लड़कियों का कहीं कोई ठिकाना नहीं है. यहां भी एक स्टीरियोटाइप टूटता है क्योंकि क्वीन अकेलेपन का जश्न मनाती है वह कमरा बंद करके रोती नहीं है. वह अकेले दुनिया घूमती है, अपने ब्वायफ्रैंड को गलती का अहसास होने पर भी दोबारा जिंदगी में दाखिल नहीं होने देती. वह अपनी आजादी का उत्सव मनाती है.
वर्ष 2010 के बाद का समय महिला प्रधान फिल्मों का रहा है. इस दौरान मजबूत स्त्री किरदारों वाली इतनी फिल्में आयी हैं कि उन पर लिखने के लिये स्पेस कम पड़ जायेगा. हम ऐसी कुछ फिल्मों की सूची दे रहे हैं जिनको देखकर आप सिनेमा की बदलती औरत पर अपनी राय कायम कर सकते हैं. ये फिल्में हैं: इंग्लिश-विंग्लिश, हाईवे, एनएच -10, तनु वेड्स मनु, कहानी, तमाशा, रॉकस्टार, बर्फी आदि. ये तमाम फिल्में सिनेमायी स्त्री के स्टीरियोटाइप को तोड़ती हैं और एक नयी स्त्री को हमारे सामने पेश करती हैं.

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